Sunday, April 30, 2017

भारत में गाँवों के विकास में मीडिया की भूमिका

                  भारत में गाँवों के विकास में मीडिया की भूमिका



असली भारत गाँवों में बसता है। भारत की जीवन शक्ति का आधार ग्रामीण समाज है। अतः गाँवों का विकास किये बिना देश का विकास संभव नहीं है। अभी भी देश की अधिकाश जनसंख्या गाँवों में ही निवास करती है। किन्तु गाँवों में रोजगार अवसरों का अभाव होने के कारण गाँव वाले गरीबी, बेरोजगारी व भूखमरी जैसी समस्याओं से त्रस्त है।
जब तक हम जनजातियों और पिछड़े वर्ग के लोगों का उत्थान करने में समर्थ नहीं तब तक भारत का भविष्य अंधकारमय रहेगा। इस उक्ति पर जरा गौर करते हैं। क्या सच में असली भारत गाँवों में बसता है, असली भारत क्या है? वह क्या चाहता है? उसकी बुनियादी जरूरते क्या है?  जब तक हम ग्रामीण भारत के विकास व विस्तार की योजनाओं पर ध्यान नहीं देंगे तब विजन 2020 का सपना साकार नहीं हो सकता है। संचार माध्यम इस कार्य को वखूबी निभा सकता है। मीडिया के अनेक रूप है। फिर चाहें वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक हो हर रूप में संचार माध्यम इस कार्य को वखूबी निभा रहे है। गाँवों और संचार माध्यमों के सम्बन्धों को समझने के पूर्व आवश्यक है कि हम संचार माध्यम को समझे ।
परम्परागत मीडिया -
भारत जैसे विकासशील देश में पम्रागत माध्यमों का अपना एक विशिष्ट महत्व व योगदान है। परम्परागत संचार माध्यम वे संचार माध्यम है। जिनमें समाज की परम्परा, संस्कृति और मूल्य समाहित हैं। यह पारम्परिक माध्यम ग्राम्य संस्कृति की देन है जिसकी मौलिकता तथा विश्वसनीयता अटूट है। यह ग्रामीण जनता के निकट होते हैं तथा इसके द्वारा ग्राम्य जीवन में व्याप्त बुराईयों को दूर किया जाता है। परम्परागत जनमाध्यम में दृश्य माध्यम के अन्तर्गत कठपुतली, नृत्य, मूर्ति, चित्र तथा स्थापत्य आते हैं। श्रव्य माध्यमों के अन्तर्गत लोकगीत, लोककथा तथा परम्परागत वाद्य यंत्र जैसे शंख, टोल, मंजीरा, बाँसुरी आदि आते हैं तथा परम्परागत दृश्य श्रव्य माध्यम के अन्तर्गत ध्वनि कठपुतली रास, रामलीला, स्वांग, रंगमंच, लोकनाट्य, जनमाध्यम के रूप में सफल भूमिका का निर्वाहन कर रहे हैं।
वर्तमान युग में भले ही नव-इलेक्ट्रानिक उपकरण आ गये हैं पर गाँवों में आज भी लोककला व परम्परागत माध्यम अस्तित्व में है।
भारत लोककला की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध राष्ट्र है। जनमानस पर त्वरित गति से इसके पड़ने वाले प्रभाव की व्याख्या करते हुए सन् 1972 की यूनेस्कों रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘पारस्परिक माध्यम व्यवहारिक परिवर्तन लाने और निचले स्तर पर विभिन्न समुदायों को समकालीन मुद्दों के प्रति जागरूक बनाने में जीवंत भूमिका निभाते हैं’’।
मुद्रित माध्यम या प्रिन्ट मीडिया-
विश्व में मुद्रण का आविष्कार एक क्रान्तिकारी घटना थी। मुद्रण का आविष्कार जर्मनी के गुटबर्ग ने 1956 में किया था। भारत में पहला प्रिटिंग प्रेस 1556 में गोवा में आया। संचार माध्यमों में सबसे व्यापक व आकर्षक माध्यम के रूप में इस माध्यम की गणना की जाती है यह माध्यम अधिक विश्वसनीय व प्राचीन है। उदाहरण दैनिक समाचार-पत्र, साप्ताहिक समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, हाउस जनरल, पुस्तकें, पम्पलेट इसके अन्तर्गत आते हैं।
समाचार-पत्र-
टी0आर0 श्रीनिवासन की पुस्तक ‘‘द प्रेस एण्ड द पब्लिक’’ के अनुसार आधुनिक युग के अनेक चमत्कार देखे जा सकते हैं। उन चमत्कारों में मेरी समझ में सबसे बड़ा चमत्कार आधुनिक समाचार पत्र हैं यह अपने आप एक चमत्कार ही नहीं वरन् अनेक चमत्कारों का जन्मदाता भी है। यह चीज को बनाता और बिगाड़ता है। यह राष्ट्र की ताकत का निर्माण कर सकता है या उसे खत्म कर सकता है। यह वह धूरी है जिनके चारो ओर समस्त संसार चक्कर लगाता है। इसने आधुनिक जीवन में केन्द्रीय स्थिति प्राप्त कर ली है। आज निश्चित रूप से समाचार पत्र का युग है तथा तात्कालिक भविष्य भी इससे अलग नहीं दिखाई देता है।
समाचार-पत्र जनमत की अभिव्यक्ति का सशक्त एवं लोकप्रिय साधन है। यह लोक शिक्षा व लोक जागृति का सशक्त साधन है।
समाचार-पत्र का विकास-
जनमाध्यम के रूप में समाचार-पत्र काफी उपयोगी है। समाज के कोने कोने की खबर व उसका विश्लेषण समाचार-पत्र के माध्यम से मिलता है। समाचार-पत्र के कम्युनिकेशन पैकेज में समाचार विचार सूचना तथा विज्ञापन सब होता है।
भारत में ब्रिटिश काल में समाचार-पत्र छपना आरम्भ हुआ। पहला समाचार-पत्र सन् 1780 ई0 में बंगाल गजट आफ कलकŸा जनरल एडवरटाइजर निकला जिसके सम्पादक जेम्स आगस्ट हिक्की थे। सन् 1826  ई0 में हिन्दी का पहला दैनिक पत्र उर्दन्त मार्तण्ड निकला। इन समाचार पत्रों का देश की आजादी के संघर्ष में अमूल्य योगदान रहा जनमाध्यम के रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन को गति दी तथा पत्र जन चेतना व जागरूकता फैलाने का हथियार बन गये, परन्तु स्वतंत्रता पश्चात् समाचार-पत्रों का उद्देश्य बदला। समाचार-पत्रों का व्यवसायिक स्वरूप हो गया। जिन पत्रों का लक्ष्य सूचना देना, ज्ञान वृद्धि करना, मनोरंजन करना था। जिन पत्रों का लक्ष्य सूचना देना, ज्ञान वृद्धि करना, मनोरंजन करना था। उन पर अब विज्ञापनदाताओं, राजनीति व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का दबाव पड़ने लगा। नये माध्यमों के प्रवेश व नयी तकनीकों के प्रयोग ने पत्रों की प्रणाली व नीतियों पर अनेक परिवर्तन किये। इन्टरनेट व फोटो पत्रकारिता की माँग बढ़ी। इलेक्ट्रानिक समाचार-पत्र भी आये।
पत्रिका-
जनमाध्यम के रूप में पत्रिकाओं की अहम भूमिका है। विभिन्न
पत्रिका-
जनमाध्यम के रूप में पत्रिकाओं की अहम भूमिका है। विभिन्न
विषयों जैसे समाचार आधारित (फ्रंट लाइन, इण्डिया टुडे, आउठ लुक) खेल पर आधारित क्रिकेट सम्राट, स्पोर्ट्स लाइन, बिजनेस, शैक्षणिक प्रतियोगी, बाल, महिला, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अनेक पत्रिकायें आ रही है। यह पत्रिकायें अनेक अवधि वाली होती है। जैसे दैनिक साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक अर्द्धवार्षिक, वर्षिक, विशेषांक आदि। हर पत्रिका का अपना पाठक वर्ग होता है।
पत्रिकाओं में विज्ञापन हेतु पृष्ठों के हिसाब से स्थान खरीदा जाता है। रंगी विज्ञापन का मूल्य अधिक होता है। इसमें कई सारी स्थायी स्तम्भ समसामयिक लेख तथा मनोरंजन सामग्री होती है। घटना की गहराई व पुष्ट प्रमाणों की सहायता से कथा तैयार करता है। पत्रिका में अधिकतर साहित्यिक व आकर्षक भाषा शैली का प्रयोग किया जाता है।
बौद्धिक वर्ग आज भी समाचारों के विश्लेषण व रिकार्ड रखने हेतु पत्रिका को उपयोगी जनमाध्यम मानते हैं।
इलेक्ट्रानिक मीडिया
रेडियो इलेक्ट्रानिक जनमाध्यम की श्रेणी में आता है। इस जनमाध्यम को श्रव्य समाचार पत्र कह सकते हैं। यह कानों का विस्तार है। सुन्दर दुर्गम स्थानों तक इसकी पहुंच है। भारत में रेडियो की शुरूआत विधिवत् ढंग से 1927 में हुयी रेडियो सस्ते दामों में मिल जाता है। यह एक जनमाध्यम के रूप में निष्पक्ष भूमिका का निर्वाहन कर रहा है। यह सस्ते दामों में उपलब्ध होता है। रेडिया का प्रसारण गाँवों और देश के दूर इलाकों में विभिन्न भाषाओं और बोली में कार्यक्रम प्रसारित करता है। इसे यात्रा के वक्त या अन्य कार्य करते हुए भी सुन सकते हैं। बिजली रहे या नहीं यह बैटरी से चल सकता है। नेत्रहीनों के मनोरंजन का तो एकमात्र सहारा है रेडियो अनपढ़, पढे़-लिखे, अमीर-गरीब सभी के समान है। जनमाध्यम के रूप में रेडिया भारतीय संस्कृति की रक्षा कर रहा है। यह एक लोकप्रिय जनमाध्यम है।
टेलीविजन-
सन् 1926 में 27 जनवरी को जॉन  बेयर्ड ने टेलीविजन का आविष्कार कर जनमाध्यमों की दुनिया में क्रान्ति ला दी। अगर रेडियो का आविष्कार एक चमत्कार था तो जनमाध्यम के रूप में टेलीविजन का आविष्कार एक आश्चर्य था। रेडियो को केवल सुना जा सकता था, जबकि टेलीविजन को देखा और सुना दोनों जा सकता था।भारत में इसका आगमन 1959 को हुआ।
टेलीविजन आधुनिक जीवन शैली का अनिवार्य व अभिन्न अंग बन गया है। वर्तमान में टेलीविजन हर घर का हिस्सा है। जनमाध्यम के साधन के रूप में टेलीविजन को ज्ञान व सूचना प्राप्ति के साथ-साथ मनोरंजन का साधन समझा जाता है। टेलीविजन ने दूरस्थ क्षेत्रों में ना सिर्फ घुसपैठ की वरन् सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में हलचल मचा कर रखी दी। टेलीविजन श्रव्य-दृश्य माध्यम है और ही सीखते है और फिर अपने व्यवहार में लाते हैं। लेकिन वर्तमान में मनोरंजन का यह माध्यम समाज के लिए चुनौती कर उभर रहा है।
भारत में सामुदायिक रेडियों का विकास-
1923-24 से रेडियो क्लब के रूप में और 1927 से भारत में रेडियो भारतीय जनमानस को शिक्षा, सूचना, मनोरंजन देने का कार्य कर रहा है।
सामुदायिक रेडियों के चलन का अभियान 1990 के दशक से शुरू हुआ। वर्ष-1991 के आसपास जैसे ही उदारीकरण के नाम पर बाजार खुला देश में कई माध्यमों की अवधारणाओं का अंकुर फूट पड़ा, यह वह दौर था, जब प्रिन्ट, इलेक्ट्रानिक मीडिया और गॉव तक पहुँच रहे थे। इन माध्यमों को प्रभावी बनाने के साथ-साथ बाजार में खड़ा करने की पुरजोर कोशिशों के बीच ही सामुदायिक रेडियों की अवधारणा पनपी।’
यद्यपि इससे पूर्व कुछ प्रयास किये गये, जो कि समुदायिक ‘‘मीडिया की भावना का पुरजोर प्रतिनिधित्व करते थे। 1980 के दशक में मैकब्राइड कमीशन की रिपोर्ट में यह सुझाव था कि स्थानीय स्तरों पर मीडिया को काम करना होगा। परन्तु वर्तमान में सामुदायिक रेडियों का जो स्वरूप है, उसकी नींव वर्ष 1995 में पड़ी थी।
‘‘वर्ष 1995 में उच्चतम् न्यायालय के न्यायाधीश पी0बी0 सावंत ने एक अहम् फैसले में कहा था कि रेडियों पर कोई एकाधिकार नहीं हो सकता और हवाई तरंगों पर सबका अधिकार है। न्यायमूर्ति ने अपने फैसले में साफ लिखा था कि हवाई तरंगे सार्वजनिक सम्पत्ति के तौर पर इस्तेमाल की जा सकती है ओर इनका उपयोग आम लोगों को शिक्षित करने और उनका जनमत विकसित करने में किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को हमारे संविधान में दी गई वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही अंग माना गया।’’
इस फैसले के बाद देश में सामुदायिक रेडियों स्टेशन स्थापित करने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण प्रयास हुए और पहली बार लोगों ने जाना कि सरकारी रेडियों नेटवर्क के अलावा भी अपने अलग रेडियों स्थापित किये जा सकते हैं।दिसम्बर, 2002 से भारत सरकार ने सामुदायिक रेडियो के लिए लाइसेंस शैक्षणिक संस्थानों देना स्वीकारा।
देश का पहला कैम्पस रेडियो 2004 को चेन्नई के अन्ना विश्वविद्यालय में खोला गया। इसका संचालन एजुकेशन एण्ड मल्टीमीडिया रिसर्च सेन्टर करता है । सारे कार्यक्रमों का निर्माण अन्ना विश्वविद्यालय के मीडिया विज्ञान के विद्यार्थियों द्वारा किया जाता है।
गैर सरकारी संगठन और नागरिक समाज निकायों की लम्बी लड़ाई के बाद 6 नवम्बर, 2006 को सूचना और प्रसारण मंत्रालय और भारत सरकार ने सामुदायिक रेडियो स्टेशन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए।
‘‘सामुदायिक रेडियो वह माध्यम है, जहॉ किसी समुदाय विशेष की जरूरतों को ध्यान में रखकर एक निश्चित भू-भाग के अन्दर रेडियों कार्यक्रमों का प्रसारण करना होता है और प्रसारित कार्यक्रमों में उस समुदाय की सक्रिय सहभागिता होना आवश्यक  है यानि समुदाय के लिए समुदाय के द्वारा समुदाय का प्रसारण।सम्पूर्ण मीडिया को समझने के साथ ही इन मीडिया में कार्यक्रमों की गुणवŸा व मुख्यधारा की सोच का  प्रभाव भी पड़ता है। अतः यदि मीडिया के कर्ता-धर्ता वास्तविक विकास और अपने कार्यो को निष्ठापूर्वक करेंगे तब भारत के गाँवों का वास्तविक विकास सही मायनों में होगा। बस आवश्यकता सही सोच के साथ जनता के वास्तविक हितों के अनुरूप कार्यक्रम बनाने की आवश्यकता है। ।
                                                            डॉ  साधना श्रीवास्तव

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