Monday, March 5, 2018

हिन्दी सिनेमा में मूल्यों के बदलते प्रतिरूप‘





उत्तर प्रदेश विधान सभा के प्रथम स्पीकर भारतरत्न पूज्य राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन जी के नाम पर उत्तर प्रदेश में मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना इलाहाबाद में  वर्ष 1999 में हुई। यह प्रदेश का एक मात्र मुक्त विश्वविद्यालय है। विश्वविद्यालय की स्थापना का मुख्य उद्देश्य दूरस्थ शिक्षा पद्धति के माध्यम से पूरे प्रदेश में  उच्च शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार करना है।

       आपको अवगत कराते हुए मुझे हर्ष का अनुभव हो रहा है कि विश्वविद्यालय द्वारा दिनांक        दिनांक 27-28 मार्च 2018 को दर्शनशास्त्र और पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में ‘‘पूर्वाह्न 1100 विश्वविद्यालय के सरस्वती परिसर में स्थित लोकमान्य तिलक शास्त्रार्थ सभागार में "हिन्दी सिनेमा में मूल्यों के बदलते प्रतिरूप"  विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और फिल्म फेस्टीवल आयोजित की जा रही है।

इस अवसर पर आपका शोध पत्र  है आप सादर आमंत्रित करना चाहते हैं।

       मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप आमंत्रण स्वीकार कर अपनी गरिमामयी उपस्थिति से विश्वविद्यालय परिवार को अनुग्रहीत करेंगे।

सधन्यवाद!

डाॅ. आर.पी.एस.यादव   डाॅ.अतुल मिश्र    डाॅ. सतीश चन्द्र जैसल    डाॅ. साधना श्रीवास्तव

   

    निदेशक        आयोजन सचिव    सह  संयोजक            संयोजक  

Tuesday, January 9, 2018

राष्ट्रवादी पत्रकारिता से देशप्रेम की अलख जगे




राष्ट्रवादी पत्रकारिता से देशप्रेम की अलख जगे


राष्ट्रवादी पत्रकारिता से देशप्रेम की अलख जगे
भारत का तिरंगा लहरा उठे, देशप्रेम की सरिता बहे।
ना बॅटो देश को टुकड़ो में कि एकता की नयी मिसाल बने।
जाति के नाम बॅटता, सम्प्रदाय के नाम पर जलता, या छोटे छोटे स्वहितों में अपनी गौरवपूर्ण इतिहास को सहेजता भारत देश फिर से सोने की चिड़िया कहलाये और वैश्विक परिपेक्ष्य में अपना तिरंगा लहराये यह बहुत जरूरी है।
यह कार्य सकरात्मक पत्रकारिता बखूबी कर सकती है।  पत्रकारिता समाज का आईना होती है। वर्तमान में पत्रकारिता ने समाज के हर वर्ग पर पर असर छोड़ा है। समाचार पत्रों, चैनलों के बीच सोशल मीडिया की अपनी धाक और पहुॅच है। अपने जन्मकाल से पत्रकारिता ने सामाजिक चेतना और स्वतंत्रता आन्दोलनों में विशेष भूमिका निभायी है। समाज के प्रति पत्रकारिता का भी एक दायित्व है।
ऐसे राष्ट्रवादी पत्रकारिता की अवधारणा भारतीय परिपेक्ष्य में आम जनमानस को  देशप्रेम और आत्मसम्मान का आत्मबोध कराती है। भारत में सन्दर्भो में राष्ट्रवाद पत्रकारिता को समझना है तो पहले राष्ट्रवाद को समझना है।
शब्दिक रूप में राष्ट्रवाद एक राजनीतिक विचारधारा, मान्यता, विश्वास है। जिसके द्वारा व्यक्ति अपने राष्ट्र के साथ अपने पन के अहसास और जुड़ाव को समझता है । अपनी पहचान को देश के  लिए समर्पित करता है। यह एक लगाव  और देशप्रेम की भवना है जिसमें राष्ट्र को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है। व्यक्ति को नहीं राष्ट्र को प्रधानता दी जाती है। अपने देश की विशेषताओं, संस्कृति, भाषा, धर्म, राजनीतिक लक्ष्य और देश के परंपराओं का पालन तथा गौरव या सम्मान किया जाता है।
भारतीय राष्ट्रवाद अनेक दृष्टिकोणों से अलग है । भारत अनेक भाषा और अनेक धर्मों का देश है। विभिन्न जातियों और उपजातियों है। अनेक समाजिक विधान और परम्परा है। अनेकता में एकता की संस्कृतियों बॅटा है। ऐसे में सबको एक साथ एक मार्ग पर चलने को प्रेरित करना थोड़ा चुनौती पूर्ण तो है लेकिन नामुकिन नहीं है।
भारतीय स्वतंत्रता काल के पूर्व की सामाजिक पृष्ठभूमि और भारत में ब्रिटिश शासन ने दौरान हुये अत्याचारों ने ही कही ना कही भारतीय राष्ट्रवाद की भावना को गति दी ।
समाजिक तथा धार्मिक आन्दोलन के जरिये राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, एवं श्रीमती एनी बेसेन्ट आदि सुधारकों ने भारतीयों में नयी चेतना का सृजन किया । स्वामी विवेकानन्द ने यूरोप और अमेरिका में भारतीय संस्कृति का प्रचार किया। शिकागों में अपने भाषण से भारतीय को सम्मानित किया ।
एक ओर यातायात तथा संचार के साधनों का विकास हो रहा था तो दूसरी ओर शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी था।
आर्थिक रूप से ब्रिटिशों की मनमानी और पक्षपात ने भारतीयों के मन में देश प्रेम की अलख जाग दी ।1957 में प्रथम स्वतत्रंता संग्राम ने जहाॅ भारतीय राष्ट्रवाद के बीज पनपे तो वही दूसरी और भारत माता के वीर सपूतों ने कलम की ताकत को पहचाना । निश्चय ही भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलनों में समाचार पत्रों, पत्रकारों और संपादकों की भूमिका अहम थी । जब ब्रिटिश सरकार ने 1878 ई0 में ‘वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट’ पास किया, जिसके द्वारा भारतीय समाचार पत्रों को नष्ट करने का प्रयास किया  तो राष्ट्रीय आन्दोलन की लहर और बहने लगी ।
लार्ड लिटन की नीति के कारण भारत में राष्ट्रीय असन्तोष आरम्भ हुआ जो कि 1883 ई0 में ईल्बर्ट बिल के साथ देश की अर्थ-व्यवस्था व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में अंग्रेजों की दोहरी मनमानी और शोषण ने भारतीय राष्ट्रवाद की जड़े मजबूत की थी ।
पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव के साथ ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, अलीगढ़ आन्दोलन ने भी शिक्षा को प्रोत्साहित किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ में मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।
स्वामी विवेकानंद जी स्वस्थ राष्ट्रवाद, विकास के साथ धर्मों के बीच संस्कृतियों के बीच आदान-प्रदान के पक्षधर थे।
बाल गंगाधर तिलक को हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है तो महात्मा गांधी के राष्ट्रवाद का सत्य, अहिंसा और असहयोग आंदोलन के साथ स्वदेशी पर बल देता था ।
तो स्वतंत्रता के राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की विचारधारा हिन्दी के उपयोग से एकता की भावना और नए समानता के सपने के साथ राष्ट्र के निर्माण पर बल देते है।
पंरतु समय के साथ बोलने की आजादी के नाम पर तो कही प्रांत, साम्प्रदायिक स्वायत्तता और सम्प्रभुता के नाम पर  संस्कृति, भाषा, धर्म, और स्वहितों की आड़ में भारतीय राष्ट्रवाद संकटकाल से गुजर रहा है तो ऐसे में कलम के सिपाहियों का उत्त्रदायित्व और बढ़ जाता है। घटनाओं की तथ्यपूर्ण देशहित में पत्रकारिता होनी चाहिये भारत वासी भम्रित ना हो बल्कि देश की अखंडता, एकता बनी रहे।
डाॅ 0 साधना श्रीवास्तव
असिस्टेन्ट प्रोफेसर
जनसंचार एवं पत्रकारिता,
उ0प्र0राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
उ0प्र0

Friday, December 22, 2017

Aaj achanak mere facebook waall ki bhaasha urdu ho gyi ....mujhe kuch samjh nhi aa raha ....kya hua ....kal morning ki cyber expert ya urdu ke jaankkar se samjhege...tab tak hm koi bhi post nhi dal rahe.........dr sadhana

Thursday, December 14, 2017

पत्रकारिता के नए आयाम

पत्रकारिता के नए आयाम 





Saturday, November 18, 2017

Vote For Samarth Srivastava - MyCuteBaby Photo Contest

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Friday, November 3, 2017

तलाश जिन्दगी की

                            तलाश जिन्दगी की
सब शून्य या नश्वर है
ये मैने सुना था कभी
फिर भी देखा
लोगों को तलाशते जिन्दगी
जीने की चाह में देखा
हर रोज लोगों को मरते देखा
कोई मान की तो
कहीं पैसों की आह भरती
फिर भी देखा
लोगों को तलाशते जिन्दगी
मानव ने कहा पे्रम है जिन्दगी
तो सन्यासी ने कहा एक मोह है जिन्दगी
एक माॅ जो लड़ रही थी
अपनी मौत से.........
देखा उसको अपनी बेटी की आॅखों में 
तलाशते जिन्दगी.................
फिर मैने जाना कि क्या है जिन्दगी
हाॅ ये नश्वर है, मोह है
फिर भी अपनों की खातिर ही जीना है जिन्दगी।
डॉ साधना श्रीवास्तव